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मूंगफली के फायदे प्रमुख रोग एवं बचाब Major Peanut benefits ,Diseases and Bachab

मूंगफली के प्रमुख रोग एवं बचाब

1. मूंगफली में मौजूद तत्व पेट से जुड़ी कई समस्याओं में राहत देने का काम करते हैं.
 इसके नियमित सेवन से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है.

2. मूंगफली खाने से शरीर को ताकत मिलती है. इसके अलावा ये पाचन क्रिया
को भी बेहतर रखने में मददगार है.

3. गर्भवती महिलाओं के लिए मूंगफली खाना बहुत फायदेमंद होता है. इससे गर्भ में पल रहे बच्चे
 का विकास बेहतर तरीके से होता है.

4. ओमेगा 6 से भरपूर मूंगफली त्वचा को भी कोमल और नम बनाए रखता है. कई लोग
 मूंगफली के पेस्ट का इस्तेमाल फेसपैक के तौर पर भी करते हैं.

5. मूंगफली खाने से दिल से जुड़ी बीमारियां होने का खतरा कम हो जाता है.

6. मूंगफली के नियमित सेवन से खून की कमी नहीं होने पाती है.

7. बढ़ती उम्र के लक्षणों को रोकने के लिए भी मूंगफली का सेवन किया जाता है. इसमें
 मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट बढ़ती उम्र के लक्षणों जैसे बारीक रेखाएं और झुर्रियों को बनने से रोकते हैं.

8. इसमें कैल्शियम और विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा होती है. ऐसे में इसके
 सेवन से हड्डियां मजबूत बनती हैं.

मूंगफली के दानों से 40-45% तेल प्राप्त होता है जो कि प्रोटिन का मुख्य स्त्रोत है। मूंगफली की फल्लियों का प्रयोग वनस्पति तेल एवं खलियों आदि के रुप में भी किया जाता है। मूंगफली का प्रचुर उत्पादन प्राप्त हो इसके लिये पौध रोग प्रबंधन की उचित आवश्यकता महसूस होती है। पौध रोग की पहचान एवं प्रबंधन इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।मूंगफली तिलहनी फसलों के रुप में ली जाने वाली प्रमुख फसल है। मूंगफली की खेती मुख्य रुप से रेतीली एवं कछारी भूमियों में सफलता पूर्वक की जाती है।

 Peanuts give 40–45% oil, which is the main source of protein. Groundnut beans are also used as vegetable oil and cakes. Appropriate need for plant disease management is felt to get abundant production of groundnut. Identification and management of plant diseases is an important endeavor in this direction. Groundnut is the major crop taken as oilseed crops. Groundnut cultivation is mainly done successfully in sandy and alluvial lands.


मूंगफली के प्रमुख रोग एवं रोग जनक{Major Peanut Diseases and Diseases} =


क्र.                    रोगरोग                                              जनक

1                    टिक्का या पर्ण चित्ती रोग                         सर्कोस्पोरा अराचिडीकोला/ सर्कोस्पोरा परसोनाटा

     
2                     रस्ट अथवा गेरूआ रोग                                 पक्सिनिया अरॉचिडिस

3                     स्टेम रॉट                                                    एस्क्लेरोसियम रोल्फ्साइ

4                      बड नेक्रोसिस                                                   बड़ नेक्रोसिस वायरस

5                      एनथ्रक्नोज                                                 कोलेटोट्राइकम डिमेटियम/ कोलेटोट्राइकम केपसिकी

S. Pathogen

1 tikka or foliage skin disease         Sircospora arachidicola / Cercospora parsonata

       
2 Rust or ocular disease                 Paxinia arochidis

3 stem rot                                      Asclerosium rolfsii

4 Bud necrosis                              Bud necrosis virus

5 Anthracnose                              Colletotrachem Dimetium / Colletotrachem


1. मूंगफली का पर्ण चित्ती अथवा टिक्का रोग-

भारत में मूंगफली का यह एक मुख्य रोग है और मूंगफली की खेती वाले सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। भारत में उगार्इ जाने वाली मूंगफली की समस्त किस्में इस रोग के लिये ग्रहणषील है। फसल पर इस रोग का प्रकोप उस समय होता है जब पौधे एक या दो माह के होते है। इस रोग में पत्तियों के ऊपर बहुत अधिक धब्बे बनने के कारण वह शीघ्र ही पकने के पूर्व गिर जाती है, जिससे पौधों से फलियां बहुत कम और छोटी प्राप्त होती हैं।

1. Peanut leaf spot or Tikka disease-

It is a major groundnut disease in India and is found in all peanut cultivated areas. All varieties of groundnut grown in India are susceptible to this disease. The outbreak of this disease occurs at the time when the plants are of one or two months. In this disease, due to the formation of too many spots on the leaves, it falls before ripening soon, due to which the legumes are obtained from the plants very little and small.


 मूंगफली का पर्ण चित्ती अथवा टिक्का रोग ( Peanut leaf spot or Tikka disease ) 

रोग लक्षण:-

रोग के लक्षण पौधे के सभी वायव भागों पर दिखाइ देते है। पत्तियों पर धब्बे सर्कोस्पोरा की दो जातियों सर्कोस्पोरा परसोनेटा एवं स्र्कोस्पोरा एराचिडीकोला द्वारा उत्पन्न होते है। एक समय में दोनो जातियां एक ही पत्ती पर धब्बे बना सकती है। सर्वप्रथम रोग के लक्षण पत्तीयों की उपरी सतह पर हल्के धब्बे के रुप में दिखाइ देते है और पत्ति की निचली बाह्य त्वचा की कोषिकायें समाप्त होने लगती है। सर्कोस्पोरा एराचिडीकोला द्वारा बने धब्बे रुपरेखा में गोलाकार से अनियमित आकार के एवं इनके चारों ओर पीला परिवेष होता है। इन धब्बों की ऊपरी सतह वाले ऊतकक्षयी क्षेत्र लाल भूरे से काले जबकि निचली सतह के क्षेत्र हल्के भूरे रंग के होते है। सर्कोस्पोरा परसोनेटा द्वारा बने धब्बे अपेक्षाकृत छोटे गोलाकार एवं गहरे भूरे से काले रंग के होते है। आरंभ में यह पीले घेरे द्वारा धिरे होते है तथा इन धब्बों की निचली सतह का रंग काला होता है। ये धब्बे पत्ती की निचली सतह पर ही बनते है।
Disease Symptoms: -

Symptoms of the disease are seen on all aerial parts of the plant. Spots on the leaves are produced by two species of Cercospora, Cercospora parsoneta and Srechospora arachidicola. Both species can form spots on a single leaf at a time. The symptoms of the disease first appear in the form of light spots on the upper surface of the leaves and the cells of the lower outer skin of the leaf begin to disappear.The pectoral area of ​​the upper surface of these spots is reddish brown to black while the area of ​​the lower surface is light brown. The spots formed by Cercospora parsonetta are relatively small spherical and dark brown to black in color. Initially they are surrounded by yellow circles and the color of the lower surface of these spots is black. These spots form on the lower surface of the leaf.



रोग नियंत्रण उपाय:-

1. मूंगफली की खुदाइ के तुरंत बाद फसल अवषेशों को एकत्र करके जला देना चाहिये।
मूंगफली की फसल के साथ ज्वार या बाजरा की अंतवर्ती फसलें उगाये ताकि रोग के प्रकोप को कम किया जा सके।
बीजों को थायरम ( 1 : 350 ) या कैप्टान ( 1 : 500 ) द्वारा उपचारित करके बोये।
कार्बेन्डाजिम 0.1% या मेनकोजेब 0.2% छिड़काव करें।

Disease control measures: -

1. The crop residues should be collected and burnt immediately after the groundnut is planted.
Grow intercrop crops of jowar or millet along with groundnut crop to reduce the disease outbreak.
Sow the seeds by treating them with thyram (1: 350) or captan (1: 500).
Spray Carbendazim 0.1% or Mencozeb 0.2%.
2. मूंगफली का गेरुआ रोग:-



मूंगफली का गेरुआ रोग



रोग लक्षण:-



सर्व प्रथम रोग के लक्षण पत्तियों की निचली सतह पर उतकक्षयी स्फोट के रुप में दिखाइ पड़ते है। पत्तियों के प्रभावित भाग की बाह्य त्वचा फट जाती है। ये स्फोट पर्णवृन्त एवं वायवीय भाग पर भी देखे जा सकते है। रोग उग्र होने पर पत्तीयां झुलसकर गिर जाती है। फल्लियों के दाने चपटे व विकृत हो जाते है। इस रोग के कारण मूंगफली की पैदावार में कमी हो जाती है, बीजों में तेल की मात्रा भी घट जाती है।


Symptoms of the first disease are seen on the lower surface of the leaves in the form of tissue blast. The outer skin of the affected part of the leaves is torn. These spores can also be seen on the petioles and pneumatic part. The leaves fall scorching when the disease is severe. Fruits are flattened and deformed. Due to this disease, the yield of groundnut decreases, the quantity of oil in the seeds also decreases.


नियंत्रण:-

फसल की शीघ्र बोआई जून के मध्य पखवाडे में करे ताकि रोग का प्रकोप कम हो।
फसल की कटाई के बाद खेत में पडे रोगी पौधों के अवषेशों को एकत्र करके जला देना चाहिये।
बीज को 0.1% की दर से वीटावेक्स या प्लांटवेक्स दवा से बीजोपचार करके बोये।
खडी फसल में घुलनशील गंघक 0.15% की दर से छिड़काव या गंधक चूर्ण 15 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से भुरकाव या कार्बेन्डाजिम या बाविस्टीन 0.1 प्रतिषत की दर से छिडके।

Control:-

Early sowing of the crop should be done in the middle of June in the fortnight so that the disease outbreak is reduced.
After harvesting, the residues of diseased plants lying in the field should be collected and burnt.
Sow the seeds at the rate of 0.1% with Vetavex or Plantwex medicine.
Sprinkler or sulfur powder at the rate of 0.15% soluble gulf in standing crop is 15 kg. Per ha Bhurkav or Carbendazim or Bavistin at the rate of 0.1%.
3. जड़ सड़न रोग:-
जड़ सड़न रोग

रोग लक्षण:-

पौधे पीले पड़ने लगते है मिट्टी की सतह से लगे पौधे के तने का भाग सूखने लगता है। जड़ों के पास मकड़ी के जाले जैसी सफेद रचना दिखाइ पड़ती है। प्रभावित फल्लियों में दाने सिकुडे हुये या पूरी तरह से सड़ जाते है, फल्लियों के छिलके भी सड़ जाते है।
Plants turn yellow and the stem of the plant adjacent to the soil surface starts drying up. Spider web-like white creations appear near the roots. The rash in the affected pods shrink or rot completely, the peels of the pods also rot.

नियंत्रण:-

बीज शोधन करें।
ग्रीष्म कालीन गहरी जुताइ करें।
लम्बी अवधि वाले फसल चक्र अपनायें।
बीज की फफूंदनाषक दवा जैसे थायरम या कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।

Control:-

Perform seed treatment.
Deep plowing in the summer.
Follow long-term crop cycles.
A fungicide of the seed such as thyram or carbendazim is 3 grams of medicine per kg. Seed treatment at the rate of seed.
4. कली ऊतकक्षय विषाणु रोग:-
कली उतकक्षय विषाणु रोग

रोग लक्षण:-

यह विषाणु जनित रोग है रोग के प्रभाव से मूंगफली के नये पर्णवृन्त पर हरिमा हीनता दिखाइ देने लगती है। उतकक्षयी धब्बे एवं धारियां नये पत्तियों पर बनते है तापमान बढ़ने पर कली उतकक्षयी लक्षण प्रदर्शित करती है पौधों की बढ़वार रुक जाती है। थ्रिप्स इस विषाणुजनित रोग के वाहक का कार्य करते है। ये हवा द्वारा फैलते है।

Disease Symptoms: -

This is a viral disease, due to the effect of the disease, the new leaf of the peanut starts showing inferiority. Tissue spots and stripes are formed on new leaves. The bud exhibits inflammatory symptoms when the temperature increases. The growth of plants stops. Thrips act as carriers of this viral disease. They are spread by air.

नियंत्रण:-

फसल की शीघ्र बुवाइ करें।
फसल की रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
मूंगफली के साथ अंतवर्ती फसलें जैसे बाजरा 7:1 के अनुपात में फसलें लगाये।
मोनोक्रोटोफॉस 1.6 मि.ली./ली या डाइमेथोएट 2 मि.ली./ली. के हिसाब से छिड़काव करें।
Sow the crop early.
Select disease resistant varieties of crop.
Intermediate crops with groundnut such as millet are planted in the ratio of 7: 1.
Monocrotophos 1.6 ml / l or dimethoate 2 ml / l. Spray according .

5. श्‍याम व्रण या ऐन्थ्रेक्नोज:-

रोग लक्षण:-

यह रोग मुख्यत: बीज पत्र, तना, पर्णवृन्त, पत्तियों तथा फल्लियों पर होता है। पत्तियों की निचली सतह पर अनियमित आकार के भूरे धब्बे लालिमा लिये हुये दिखाइ देते है, जो कुछ समय बाद गहरे रंग के हो जाते है। पौधों के प्रभावित उतक विवर्णित होकर मर जाते है और फलस्वरुप विशेष विक्षत बन जाते है

5. Shyam ulna or anthracnose: -

Disease Symptoms: -

This disease mainly occurs on seed paper, stem, petioles, leaves and pods. On the lower surface of the leaves, irregular brown spots appear with redness, which becomes darker after some time. The affected tissue of the plants die due to discoloration and consequently become particularly deformed.


नियंत्रण:-

ग्रीष्मकालीन गहरी जुताइ करें।
प्रमाणित एवं स्वस्थ बीजों का चुनाव करें।
संक्रमित पौधों के अवषेशों को उखाड़ कर फेक दे।
बीजों को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या मेनकोजेब (0.31)% या कार्बेनडॉजिम (0.7) % द्वारा बीजोपचार करें।
organic farming:
मूंगफली
जैविक खेती:
दलहन
फ़सल
Control:-

Deep summer.
Choose certified and healthy seeds.
Throw away the residues of infected plants.
Seed the seeds by copper oxychloride or mancozeb (0.31)% or carbendozyme (0.7)%.
organic farming:
peanut
Organic farming:
Pulses
Crop


mungfali

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